बुधवार, 28 सितंबर 2022

प्रेम प्रतिबिंब होता है

 


यकीन कीजिए प्रेम प्रतिबिंब होता है और मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ क्योंकि आप देखिएगा किसी सुर्ख गुलाब को देखने पर ही हमारे अंदर भाव अनुभूति बनकर संचारित होते हैं, अनुराग जागता है, नज़रिया बदलता है और हम प्रेम का स्पर्श पाने लगते हैं। हमें अक्सर प्रेम का आकर्षण पसंद होता है, हम उसे बांध लेना चाहते हैं लेकिन प्रेम सौंदर्य का चेहरा है और सौंदर्य की अपनी आयु है उसके पश्चात वह पतझड़ सा झड़ने लगता है, सौंदर्य को पा लेने और उसे अधिग्रहित कर लेने के भाव हमें असहज बनाते हैं। आपने चंद्रमा पानी में देखा होगा, बस वही प्रेम है। कारण है चंद्रमा का अक्स उस पानी की सतह पर जितनी देर स्थिर है प्रेम का वही क्षणिक भाव हमारे लिए उपलब्ध है। प्रेम की यह क्षणिक अनुभूति ही आपको सार्थक बना जाती है। सौंदर्य पर एक बात हमेशा कहता हूँ कि उसे आप केवल महसूस कीजिये उसे छूने का प्रयास न करें... वरना या तो आप खत्म होंगे या वह सौंदर्य। प्रेम और उसका प्रतिबिंब तभी तक है जब तक आप उसे महसूस कर रहे हैं। आपने पक्षियों को देखा होगा वह प्रकृति से अनूठा प्रेम करते हैं, पूरी उम्र अनेक वृक्षों की शाखाओं पर बैठते और उड़ते हैं, हर वृक्ष की कुशलक्षेम पूछते हैं, किसी एक पर ठहरते नहीं हैं। अगर हम कहें कि प्रेम में सौंदर्य ही सर्वश्रेष्ठ होता है तो फिर झुर्रियों वाली उम्रदराज मां क्यों जिंदगी का अहम हिस्सा होती है, प्रेम में यदि चेहरा ही सबकुछ होता है तो साथ जीती पत्नी उम्र बढ़ने पर हमारे और करीब कैसे होती है ? प्रेम का शरीर नहीं होता, वह वैसे ही नज़र आएगा जैसा हम चाहेंगे...। प्रेम की अनुभूति को हम एक अध्याय मानकर अपने जीवन की डायरी का एक पन्ना बना लेते हैं, पूरी उम्र उसे पढ़कर आनंदित होते हैं। जब जब हम प्रेम को समझ पाने में नाकाम होते हैं हम अंदर से गुस्सैल और स्वार्थी हो उठते हैं, हम असल नहीं देखते, उस अनुराग को हर हाल में हासिल कर लेना चाहते हैं, यह अवस्था हमें अपने से कोसों दूर ले जाती है। प्रतिबिंब प्रेम का चेहरा है जिसे आप बेहद करीब से देख सकते हैं। प्रेम को समझना कोई दर्शन नहीं है, एक सीधी सी गढ़ी हुई इबारत है... पढ़ जाईये यह आपके अंदर ताउम्र महकता रहेगा।।



सोमवार, 26 सितंबर 2022

सोचिए हम क्या अंकुरित कर रहे हैं..?

सोचना होगा हम क्या अंकुरित कर रहे हैं...

स्कूल शिक्षा के लिए हैं, बच्चे सीखते हैं, किताबों से, प्रायोगिक तरीकों से...। आज प्रकृति और वन्य जीव खतरे में हैं... समझना मुश्किल है कि कैसे बचेंगे...? हमें सही अंकुरण बच्चों में करना होगा... आपने इस तरह जीवों की प्रतिकृति अनेक स्कूलों, सार्वजनिक स्थानों पर देखी होंगी...। हम बो रहे हैं बच्चों के विचारों में कि इन प्रतिकृति में कचरा भर सकते हैं...। सोचिए वह किन उदाहरणों और सबकों के साथ बड़ा होगा... और ऐसे में वह प्रकृति और वन्य जीवों के प्रति कितना सकारात्मक होगा... समझना मुश्किल नहीं है...। हम कोमल मन पर जो लिखेंगे वही हमेशा के लिए छप जाएगा... और हम उन्हें यह क्यों बता रहे हैं कि इनके पेट कचरा भरने को हैं... बेहतर होता कचरा पेटी बिना शक्ल के ही होती...। ऐसा मत कीजिए।  बच्चों को समझाईये और यह प्रतिकृति रखिए लेकिन इसलिए कि इन्हें संरक्षित करना है, इन्हें बचाना है...। बच्चे अबोध होते हैं लेकिन हम पढ़े लिखे हैं... सोचिए कि कुछ तो भी सिखाया तो पीढ़ियां कचरा. हो जाएंगी फिर ढोते रहिएगा उन्हें बर्बाद प्रकृति के बीच बेदम बनाकर...। 

संदीप कुमार शर्मा, 
संपादक, प्रकृति दर्शन, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका।
मोबाइल- 8191903651

मंगलवार, 16 अगस्त 2022

किसी को बादल...किसी को बाढ़...

हे ईश्वर ये कैसा दौर है, कहीं बारिश का इंतज़ार है तो कहीं बारिश प्रलय कही जा रही है। यह कैसा दौर है जो हिस्से सूखे रह जाया करते थे आज बाढ़ की चपेट में हैं और जहां प्रचुर बारिश थी वहां औसत बारिश भी नहीं हुई...। यकीन मानिए कुछ तो बदला है हमने और हमारी सनक ने...। प्रकृति का अपना नजरिया है और वह सालों से जांचा परखा है...। हमने नदियों को रास्ता नहीं दिया उनके रास्ते में आ गए, हमने नदियां खत्म कीं, जंगल उजाड़े, प्रकृति को ताकत देने वाले पौधे हमने नकार दिए, हमें स्वाभाविक प्रकृति पसंद नहीं है, हमें प्रचंड गर्मी में अथाह ठंडक चाहिए, हमें ठंड में कृत्रिम गर्मी चाहिए...। हमें बारिश केवल बाढ़ की तरह ही आफत लगती है, हमें बच्चों से प्रकृति पर बात करना पसंद नहीं है, हम पक्के घर, शहर और सीमेंट जैसी मानसिकता को अपना चुके हैं...। दोष किसी को मत दीजिए सालों प्रकृति ने संतुलित बंटवारा किया, अब जो हो रहा है वह हमारी जिद है, हमारी सनक है...। एक खूबसूरत दुनिया हमने ऐसी बना दी है... सोचिएगा... अभी बहुत है जिसे समझना होगा...। पहले कच्चे घर और दालान होते थे, रौशनदान होते थे, गांव में लगभग हर घर एक वृक्ष होता था, हरेक के पास समय होता था, मौसम पर बात होती थी। तब एक सप्ताह की झड़ी होती थी लेकिन आपदा नहीं होती थी, सुव्यवस्थित नगर संयोजन था, बारिश के पहले नालियां और नाले साफ होते थे, नदियां स्वतंत्र अपनी राह बहती थीं, हम खुश रहते थे, दूसरों के साथ मिलकर चलते थे, बारिश की मनुहार में गीत गाए जाते थे... अब सबकुछ बदल गया है...। क्या करें ...बस चिंतन कीजिए...। 

 

बुधवार, 10 अगस्त 2022

‘बाढ़ ढोते शहर’ दोषी कौन...?

 
राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘प्रकृति दर्शन’ का अगस्त माह का अंक तैयार है....तकनीकी कारणों से देरी से आ रहा है इसलिए क्षमाप्रार्थी हैं। आवरण पर ख्यात वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर अखिल हार्डिया, इंदौर, मप्र का फोटोग्राफ है...। अंक इस लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि बाढ़ अब एक चुनौती बनती जा रही है, हमने सवाल उठाए हैं कि क्या केवल नदियां दोषी हैं बाढ़ के लिए....या हमें नगर नियोजन की समझ कम हैं या हमारा नगर नियोजन ठीक होना चाहिए...? महत्वपूर्ण सवाल उठाता यह अंक देखिएगा...।
यह अंक ऐप भी उपलब्ध है...ऐप आप गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं..। ऐप पर पत्रिका के कुछ अंक पूरी तरह से निःशुल्क हैं। आप यदि पहली बार पत्रिका देख रहे हैं और पढ़ना चाहते हैं तो आप अपना व्हाटसऐप नंबर 8191903651 पर भेज सकते हैं, अपने संपूर्ण परिचय के साथ, ये भी लिखिएगा आप पाठक हैं या लेखक हैं। 
आभार...


संदीप कुमार शर्मा
संपादक, प्रकृति दर्शन, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका


 

शनिवार, 30 जुलाई 2022

ये जो मन है ना...


यह मन उम्मीदों के गुब्बारे जैसा है, हर पल नई उम्मीद, बस खोजता ही रहता है। कई दफा मन की दुनिया हकीकत से उलट सोचती है। मन का आधार भाव और भावनाएं हैं वहीं दिमाग तर्क पर फैसले सुनाता है। सोचता हूँ निर्णय के लिए उस परम पिता ने यह दो तरीके क्यों रखे होंगे। क्या केवल तर्क पर निर्णय ठीक नहीं होते या केवल भावनाओं पर फैसलों पर सवाल उठते हैं? इस दुनिया को उस परमात्मा ने खूबसूरती से रचा है, केवल तर्क की दुनिया सख्त और बहुत सख्त हो जाती तो संभवतः ये मन की दुनिया रचाई... जैसे बिना खुशबू फूल का महत्व नहीं है... वैसे ही जीवन में भाव और भावनाओं का भी महत्व है। मन दिमाग की परवाह नहीं करता और दिमाग मन से बगावत करता रहता है। मन अपनी दुनिया रचता है, बसाता है, बुनता है लेकिन यह भी सच है केवल खुशबू से ही फूल और जीवन सुरक्षित नहीं रह सकते, उसकी सुरक्षा का निर्धारण दिमाग करता है। इन दोनों के बीच सामन्जस्य बैठाना जरूरी होता है। तारतम्यता जरूरी है क्योंकि मन भाव की भाषा जानता है और दिमाग के अपने सख्त अध्याय होते हैं। यह विषय बहुत मंथन का है... ईश्वर ने दोनों दिए हैं तो अर्थ दोनों का है...। समझिए और निर्णय लीजिए। 

रविवार, 24 जुलाई 2022

मेरी फोटोग्राफी---नज़र का कमाल है

 ये नज़र का कमाल है... अक्सर छत की मुंडेर या दीवार पर खुरचना या कुरेदना मानव प्रकृति है... कुरेदते वक्त हम अनायास ही सृजित कर रहे होते हैं, मैंने यही कुछ आज खोजा... जब में इन खुरचनों को देख रहा था उसी समय मुझे इनमें जीवन और कुछ बोलते चित्र नज़र आए...। आप भी देखिए और महसूस कीजिए...। हमारे आसपास बहुत है खुश रहने को...बस हम अपनी नज़र और नजरिया बदल लें...।

हरेक चित्र देखिएगा... कुछ हटकर नज़र आएगा।








सोमवार, 27 जून 2022

सिखाता तो ज़र्रा भी है...सीखते जाईये

 


हम जब पिता की उंगली थामकर चलना सीखते हैं तब सबसे अधिक भरोसा भी उन्हीं पर करते हैं, एक दिन पिता उंगली छोड़ देते हैं ताकि हम अपना नियंत्रण अपने शरीर, जीवन पर बना सकें, हम सामन्जस्य बनाना सीखें हालात और राह से। एक दिन हम चलने लगते हैं, पिता के बिना भी। एक दिन केवल हम चलते हैं पिता नहीं होते, लेकिन तब हम अपने बुने रास्तों पर चलते हैं, तब आपको कोई रोकता नहीं है और न ही आप पीछे मुड़कर देखते हो...। यही प्रकृति है और यही सच। किसी ने सच ही तो कहा है ये पूरी उम्र एक विद्यालय है और यहां हरेक ज़र्रा आपको सिखाता है, आप उम्र के थकने तक सीखते ही रहते हैं, सीखना एक बेहतर प्रक्रिया है क्योंकि आप जाग्रत होते हैं, अंदर कहीं अपने अंदर ठहर नहीं जाते, जो सीखते नहीं है वह कहीं ठहर चुके हैं, समय से सीखते जाईए और जो भी वह आपको सिखाए उसे सहर्ष आत्मसात कीजिए क्योंकि समय वह सिखाता है जो हमारे लिए जरुरी होता है। 

सोचता हूं कितनी सशक्त है प्रकृति और कितना सशक्त है उसके हरेक ज़र्रे का आत्मबल। सीखते जाईये क्योंकि सीखना एक अच्छी आदत होती है, उनसे भी सीखिए जो आपको पसंद करते हैं, उनसे भी सीखिए जो आपको नापसंद करते हैं, मैं तो कहना चाहता हूं उनसे अधिक सीखिए जो आपके व्यवहार के प्रतिकूल सोचते हैं, भूलिए मत कि इस मौजूदा दौर में हरेक व्यक्ति एक युनिवर्सिटी हो चुका है, कोई कहकरा सीखकर कोई कहाकरा अपनाकर। एक दिन सीखते-सीखते सभी उम्रदराज हो जाएंगे, चेहरे पर सभी के उम्र एक नक्शा खीचेंगी, संभव है वह भयावह हो और संभव है वह आपके अनुभव की किताब के तौर पर पढ़ा जाए। इस प्रकृति में कुछ भी तो स्थायी नहीं है, मौसम बदलते हैं, सौंदर्य बोध से इठलाने वाले फूल और पत्ते एक दिन स्वतः ही झर जाते हैं और जमीन पर आ जाते हैं। तपिश को गुमान होता है तो बारिश उसका भ्रम तोड़ देती है, सोचिए कि उस परमपिता को इस संसार के असंख्य प्राणियों, वृक्षों, पंच महाभूतों के तंत्र से चलने वाले सिस्टम को संचालित करना होता है, लेकिन वह फिर भी सीखता है, हरेक बार आपको निराशा होती है कि प्रकृति बदल गई है लेकिन ऐसा कुछ होता है कि आप दोबारा भरोसा करते हैं कि अभी उम्मीद बाकी है। 

सीखते जाईऐ दोस्तों यह दुनिया बहुत कुछ सिखाती है, वह भी जो आप सीखना चाहते हैं, वह भी जो आप नहीं सीखना चाहते हैं, वह भी जिसे आप पसंद करते हैं और वह भी जिसे आप नापसंद करते हैं, यह सभी सिखाएगी। आत्मसात कीजिए और आत्ममंथन भी कि इस दौर में यदि जीना है तो हरेक व्यक्ति में अपना एक सबक तलाशिये, हरेक सबक को आत्मसात कीजिए और बेहतर करते जाईऐ...। संभव है कि आपको यह भी लगने लगे कि सब आपकी मर्जी के खिलाफ हो रहा है लेकिन फिर भी सीखिए कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, सीखिए कि आप हमेशा एक विद्यार्थी हैं, इस संसार को उस परमपिता ने रचा है और इसमें कितना कुछ है आप वह पूरी तरह कभी नहीं खोज सकते, आप देखेंगे तो आप एक तिनके हैं जिसका अपना ओरा है, जानने को पूरी दुनिया है, खूब सीखिए और समझिये क्योंकि सीखने से आप संभव है तकलीफ के समय में भी मुस्कुराना सीख जाएं और मेरे दोस्त यह भी कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। सौंदर्य बोध सभी को होता है और सभी इस दुनिया में एक कोरे कागज की तरह जन्म लेते हैं, लेकिन मुख्य तो यह है कि जब इस दुनिया में रहते हुए हम उम्रदराज हो जाएं तो हमारे जीवन की किताब एक बार अवश्य देखनी चाहिए कि हमने उस पर कितना खरा और कितना सहज लिखा है, हम कितना सच लिख पाए, कितनी बेहतर सोच उकेर पाए, कहीं यह तो नहीं कि हमारी यह किताब केवल लकीरों से भरी हुई है, केवल यह तो नहीं कि हम इस पर लिखना कुछ और चाहते थे और लिख कुछ और ही गए, कहीं ऐसा तो नहीं कि यह खाली ही रह गई, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस पर हमने कोई जंजाल उकेर दिया जिसमें कहीं न कहीं हम स्वयं उलझकर रह गए और जिसे हम नहीं लिखना चाहते थे। कुछ भी हो सकता है और कुछ भी सोचा जा सकता है, यह जीवन दर्शन है....चर्चा करते रहेंगे...दोबारा फिर किसी और विषय पर मंथन के साझीदार होंगे....। तब तक अपना ध्यान रखें और हरेक पल सीखें।  

आपको एक सलाह और देना चाहता हूं कि एक किताब है विवेकानंद के विचारां पर ‘स्मृति सीमा से परे सोचने का तरीका’ अवश्य देखिएगा आपको बहुत कुछ नया मिलेगा। 


संदीप कुमार शर्मा, ब्लॉगर

प्रेम प्रतिबिंब होता है

  यकीन कीजिए प्रेम प्रतिबिंब होता है और मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ क्योंकि आप देखिएगा किसी सुर्ख गुलाब को देखने पर ही हमारे अंदर भाव अनुभूति ब...