बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

तब कोई कविता अधर में नहीं छूटेगी

अमूमन मैं टीवी कम ही देखता हूं लेकिन इन दिनों इंडियन आइडल का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें ख्यात और सदी के गीतकार संतोष आनंद पहुंचे थे। उम्र और हालात ने उन्हें क्या से क्या बना दिया ये दुनिया ने देखा। नवोदित कलाकार जो उनके गीत सुनकर बडे़ हुए हैं जब मंच पर व्हील चेयर पर बैठे संतोष आनंद से उनके इस हालात में रूबरू हुए तो जैसे सपनों की जमीं हिल गई, पैरों के नीचे से सपने टूटकर किसी सख्त सी चट्टान से जा टकराए। ओह...संतोष आनंद लड़खड़ाते शब्दों में जीवन बयां कर रहे थे, सच बयां कर रहे थे और पूरा मंच, देश और फिल्मों की वो चमकदार दुनिया सुन रही थी। सब हक्का-बक्का थे, लेकिन खामोश। कहना चाहता हूं कि संतोष आनंद अकेले नहीं हैं जिनके हिस्से संघर्ष आया है और वो भी इस कदर कि वे व्हील चेयर पर आ पहुंचे और जीवन घुटनों पर और सपनों का तो क्या कहें वे तो अतीत के दिनों की तस्वीर की फ्रेम में समाकर उस सीलन की भेंट चढ़ गए। संतोष आनंद जब मंच पर पहुंचे और उनकी आपबीती और जीवन का सच बयां हो रहा था तब वहां मौजूद हरेक की आंखों में आंसू थे, हालांकि संतोष आनंद पहले कलाकार नहीं हैं जिन्हें बुजुर्ग होने पर जीवन ने मुश्किलों की भंवर में उलझा दिया, उनसे पहले भी बहुत थे लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि इस इंडस्टी में आगे कोई संतोष आनंद की भांति हालात के शिकंजे में नहीं उलझेगा। बहरहाल उस गमगीन माहौल में एक बहुत गहरी राहत हुई वो ये देखकर कि हमारे पास यदि संतोष आनंद हैं तो नेहा कक्कड़ भी हैं...मैं उनकी तारीफ इसलिए नहीं कर रहा हूं कि उन्होंने संतोष आनंद जी को पांच लाख की मदद देने की बात कही, मैं इसलिए खुश हूं कि उन्होंने वो शुरुआत की जो इस फिल्म इंडस्टी में काफी पहले हो जानी चाहिए थी। मदद के लिए हाथ बढ़ाया और वो भी पूरे मन से। उन्होंने एक नजीर रखी है और ये नजीर यदि ये इंडस्ट्री अपनाती है तो यकीन मानिए कि कोई कविता अधर में नहीं छूटेगी, कोई कलाकार बूढ़ा नहीं होगा, किसी को आखिर समय में कालकोठरी सा जीवन नहीं मिलेगा। यहां बात कहना ये भी जरुरी है कि संतोष आनंद का कद उस व्हील चेयर पर भी कितना उंचा था ये पूरी इंडस्टी ने देखा, उन्होंने पहले मदद को स्वीकार नहीं किया कहा कैसे ले लूं स्वाभिमानी दूं...लेकिन जब नेहा कक्कड़ ने जिद करते हुए उन्हें कहा कि ये मानिए कि आपकी पोती की ओर से ये है तब वे तैयार हुए....ओह ये जीवन कितना कुछ दिखाता है....वाकई जिंदगी कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है....सच और गहरा सच...।


मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

ऐसे तो हार जाएंगे... हमेशा के लिए.

 


बहुत दिनों से सोच रहा था ये फोटोग्राफ पोस्ट करूँ...लेकिन समझ नहीं आया लिखूंगा क्या..? ये सच है... इसे आप नेचर मानें, राजनीति मानें, सिस्टम मानें, राजनीतिक निष्ठा मानें, आचार, विचार, संस्कार कुछ भी मानें...हम अंदर से सूखा दरख्त हो गए हैं, अंदर सदियों और संस्कारों का सूखा है और बाहर अनचाही दीमक...। आखिर ऐसे क्यों हैं... हम इतने उदासीन होकर चेतना के परे कैसे जा सकते हैं...। 
दरअसल हमने बुरों में से कम बुरा चुनना सीख लिया है...हम ज़ेहनी तौर पर हार रहे हैं, दास्ता स्वीकार करना. हमें आ गया है...। हमें जीतना नहीं है... हमें हार पर सीखना भी नहीं है...। हम ऐसे तो हार जाएंगे... हमेशा के लिए...।




I had been thinking since these days that I should post these photographs… but I did not understand what I will write ..? This is true… believe it to be nature, believe politics, believe in the system, political allegiance, conduct, ideology, rituals… anything… we have been drained from inside, centuries and rites have been drained from the inside and outside. Unwanted Termites…. After all, why are we so… how can we go beyond consciousness by being so indifferent….
In fact, we have learned to choose less evil than evil ... we are losing defeat, accepting the story. We have arrived…. We do not have to win… We do not even have to learn on defeat…. We will lose like this… forever….

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

घर में एक झरोखा अवश्य रखना

अब न झरोखा है, न रोशनी, न ही उम्मीद, न ही कोई खिलखिलाती पत्तियों वाले नवयोवन से मदमस्त वृक्ष...। अब बस मकान है, मकानों के बीच फंसा हुआ, जबरदस्ती उलझा हुआ, दबा-कुचला सा...। महानगर में प्रकृति और उसे देखने का उत्साह वेंटीलेटर पर है, सभी को तरक्की चाहिए, वृक्ष किसी को नहीं चाहिए, भागती हुई जिंदगी में पसीने से लथपथ अवस्था में छांव भी चाहिए लेकिन वृक्ष नहीं चाहिए...ओह वो झरोखा आखिर कहां खो गया जो हवा नहीं बल्कि जिंदगी की ताजगी साथ लाकर मकान को घर बना जाया करता था...अब मकान गर्म में ठंडे हैं लेकिन बैचेन और बीमार...थके हुए पस्त से..। मैं देख रहा हूं शहरों और महानगरों में तो मकानों में जैसी प्रतिस्पर्धा चल रही है, गलियां एक दूसरे पर हावी होना चाहती हैं, मकानों की तो कोई बखत रही नहीं क्योंकि महानगरों में मल्टी जो बनने लगी हैं, महानगर में बसाहट की यदि व्याख्या करना हो तो मैं यहीं कहूंगा कि इस दालान में अब इंसान कहां, यहां तो भीड रहती है, जज्बात कहां, यहां तो मौकापरस्ती रहती है..। चलिये ये तो महानगरों की अपनी जिंदगी है जो उसने खुद चुनी है...। छोटे शहर भी महानगर हो जाना चाहते हैं क्योंकि उसके रहवासी चाहते हैं कि वे भी महानगर जैसे ही नजर आएं...अब रह गए गांव...। गांव अब भी खुले हैं, हवा है, खेती है, वृक्ष हैं, अपनों के लिए समय है, चौपाल है, चौपाल पर सुख-दुख साझा हो रहे हैं, उम्मीद है...। मैं यहां किसी पर आक्षेप नहीं लगा रहा हूं लेकिन इतना अवश्य पूछना चाहता हूं कि आखिर जिंदगी इतनी तंगहाल हो कैसे गई...। हमने घर को कैदखाने जैसा बना लिया है, हमें हवा से अधिक सुरक्षा चाहिए, छोटे घरों की छतें अब बेमतलब साबित हो रही हैं, क्योंकि वहां हवा नहीं है, शहरों और महानगरों में हरियाली केवल दालानों और गमलों तक सीमित क्यों होती जा रही है...। खैर, मैं तो इतना ही कहना चाहता हूं घर में कोई ऐसा झरोखा अवश्य रखना जिससे आप उस प्रकृति को देख सको, निहार सको और वो उस झरोखे आपके जीवन में बिना संकोच के प्रवेश कर जाए..। पर्वतीय हिस्सों में जो घर बनते हैं उनकी खासियत है कि वे अपने घर खुले-खुले बनाते हैं...। सोचिये उस झरोखे के बारे में जो हमें जिंदगी देता है, उम्मीद देता है...लेकिन महानगर में ये झरोखे भी नहीं है, सबसे अहम बात तो ये है कि प्रकृति यहां उतनी ही और वैसी ही हो रही है जितनी जगह हम इंसान शेष रहने दे रहे हैं, हमें रहना है...लेकिन ऐसे दमघोंटू माहौल में रहकर कितना जी पाएंगे...कम से कम बच्चों की सोची ही जा सकती है...।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

पत्थरों से बतियाती है क्रोधित नदी


किसी नदी के भीतर पत्थरों का शोर कभी सुना है, सुनियेगा क्योंकि वह शोर सामान्य नहीं होता। वार्तालाप होता है बहती हुई नदी और पत्थरों के बीच। नदी के साथ बहते पत्थरों के जिस्म बेशक कई बार चोटिल होते हैं लेकिन वे परवाह किए बिना नदी की सुनते हैं। तेज और गुस्सैल नदी पत्थरों से कहती है और पत्थरों से ही बतियाती है क्योंकि उसके क्रोध के शब्द और भाषा केवल पत्थर समझ सकते हैं। वे रोकते हैं उस नदी को उसके क्रोध को उसके चीख और समझाने का भी प्रयास करते हैं कि ये धरा तुम्हारे नेह से अंकुरित होती है, यहां असंख्य अंकुरण तुम्हारे नेह के कारण हैं। तुम्हारे क्रोध से ये अंकुरण हमेशा के लिए तहस नहस हो सकते हैं। क्रोध और गुस्सा वैसे भी नदियां का काम नहीं है, लेकिन पत्थर ये भी कहते हैं कि तुम्हें समझाइश के लिए यूं चीखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम्हारी इस चीख में सदियों बहरी जाएंगी और ये संसार कुछ भी समझ नहीं पाएगा। तुम्हारा शांत जल जीवन दे रहा है, उम्मीद दे रहा है, जीना सिखा रहा है, हम समझते हैं कि मानव की ये दुनिया तुम्हें और तुम्हारे नेह को भूलती जा रही है, कोई बात नहीं यदि तुम्हें क्रोध करना है तो हम पत्थर हैं हमें उछाल दीजिए लेकिन इस धरा पर अपना वही चेहरा, वही पहचान कायम रखिये जिससे जीवन महकता है, उम्मीद पाता है। तेज बहती नदी कहती है देखो तो सही मेरे जिस्म में प्लास्टिक भरा जा रहा है, क्या में इसीलिए इस धरा को पोषित कर रही हूं, पत्थर कहते हैं ये मानव समझेगा और तुम्हें बचाएगा भी, बस तुम क्रोध न करना। पत्थरों  का दर्द सुनकर विनम्र हो जाती है और सहज होकर प्रवाहित होने लगती है। 



Have you ever heard the noise of stones inside a river, will listen because that noise is not normal. Conversation takes place between a flowing river and stones. The bodies of stones flowing along the river are of course injured many times but they listen regardless of the river. The swift and angry river speaks with stones and utters itself with stones because only the words and language of its anger can understand it. They stop the river to scream its anger and also try to convince them that this stream sprouts from your Nehru, there are innumerable sprouts here because of your Neh. These sprouts can be destroyed forever by your anger. Anger and anger are not the work of rivers anyway, but the stones also say that you do not need to scream like this because you will be deaf for centuries in this scream and this world will not understand anything. Your water is giving life, giving hope, teaching us to live, we understand that this human world is forgetting you and your soul, no matter if you want to be angry then we are stones. But on this earth, maintain your same face, the same identity, which makes life important, gets hope. The fast flowing river says, see if plastic is being filled in my body, is this why I am nurturing this earth, the stone says it will be understood by humans and will save you too, just do not make you angry. Hearing the pain of the stones, one becomes humble and starts to flow easily.


रविवार, 14 फ़रवरी 2021

तिनकों का सौंदर्य


जी हां तिनकों का अपना समाज और अपना सौंदर्य होता है, सांझ को जब सूर्य धरती के दूसरे छोर पर सुस्ताने पैर लटकाए मुंडेर पर बैठता है तब वो तिनकों से भी बतियाता है, उनकी कुशलक्षेम पूछता है। सांझ से बतियाते तिनके देखे और सुने हैं तुमने... मैंने सुना है... जाते सूर्य को ऊंची घास के सिर पर बैठ देखते हैं...। तिनकों का समाज पैरों तले रौंदा जाता है लेकिन चीखता नहीं है, शोर भी नहीं मचाता, अलबत्ता दर्द से कराहता अवश्य है। सुना है तिनके अपना समाज नए तरीकें से गढ़ने की जिद पर आमादा हैं वे अब अपना कद भी चाहते हैं और सम्मान भी...। हालांकि कुछ उम्रदराज़ तिनके अब भी चाहते हैं कि तिनके अपने क्रोध को आत्मस्वाभिमान पर हावी न होने दें...लेकिन युवा तिनके चाहते हैं जूतों वाले समाज भी नए सिरे से सोचना शुरू कर दें...वे बस इतना चाहते हैं तिनके भी मानवीय दायरे में लाए जाएं...।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

पहाड़ पर जीवन का भविष्य...

अगले अंक का विषय...

पहाड़ पर जीवन का भविष्य...

राष्ट्रीय मासिक ई पत्रिका ’ प्रकृति दर्शन’ का अगला अंक पहाड़, ग्लेशियर और प्रकृति पर केंद्रित रहेगा...। हाल ही उत्तराखंड में ग्लेशियर खिसकने की घटना ने सोचने पर विवश कर दिया है कि ग्लेशियर और पहाड़ पर प्रकृति का भविष्य और चेहरा कैसा होगा ? दुनियाभर में इस घटना पर रिसर्च हो रही है, ग्लेशियरों का कमजोर होना भी वैश्विक चिंता का कारण है...। पहाड़ खूबसूरती के लिए पहचाने जाते हैं लेकिन ऐसी  घटनाओं से तो पहाड़ पर भविष्य में जीवन की उम्मीद भी धुंधलाने लगी है...। प्रमुख और गहरा विषय है...। 

आप इस पर आलेख हमें ईमेल कर सकते हैं...। फोटोग्राफ मेल कर सकते हैं...। विषय से संबंधित और जानकारी व्हाट्सएप पर भी ली जा सकती है..। आलेख, स्टोरी आप 24 फरवरी तक मेल कर सकते हैं...।

ईमेल- editorpd17@gmail.com

व्हाट्सएप- 8191903651

(फोटोग्राफ गूगल से साभार)




मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

रंग भी तराशे गए होंगे कुछ कोरी आंखों से


झरोखे सच कहते हैं... मन में दबा हुआ सच उन्हें महल का दरबान बना देता है... । मन से जिस्म तक घूरती आंखें अक्सर झरोखे की तहजीब पर उंगली उठाती हैं... लेकिन झरोखा विचलित नहीं होता... वो शर्म ओढ़े खड़ा रहता है...। अक्सर हमने पुराने किलों में झरोखे देखें होंगे वे अब तक अपनी आचार संहिता में तैनात हैं। इतिहास गवाह है कि झरोखों से साजिशों ने भी झाका होगा और नेह के रंग भी तराशे गए होंगे कुछ कोरी आंखों से। कुछ रंग चेहरों के, कुछ विवशता की टूटन, कुछ हार का भय, बहुत सी जीत का उल्लास। झरोखों से पूछा जाता कि क्या कुछ कहना चाहते हैं इतिहास में अपनी मौजूदगी पर। मुझे यकीन है वे बहुत कुछ ऐसा कहते कि शब्द सूखी किताब के पन्नों में गहरे गढ़ जाते, मैं देखता हूं उन्हें अब भी, वे किसी आंख के करीब आते ही अपने आंसु अक्सर पोंछ लिया करते हैं, झरोखों को देखियेगा अबकी जाएंगे जब भी किसी पुराने से किले की टूटी से दीवारों की जब्त सी खिड़की में। 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

विरक्ति और वैराग्य में अंतर है



विरक्ति और वैराग्य में अंतर है। दोनों अवस्था अलग हैं लेकिन श्रेष्ठ अवस्था किसे कहेंगे... क्योंकि दोनों में ही जीवन से दूरियां हैं...। संभव है हममें दोनों को लेकर मतभेद हों या वैचारिक समानता लेकिन एक सत्य है कि जीवन की असल तलाश भी उसके खोने और उसमें खोने से ही होती है। मैं समझता हूँ विरक्ति में वैराग्य के आरंभिक अंश, मूल निहित हैं। वैराग्य खो जाने का चरम है...। खो जाने में पा जाने की आंशिक आवृत्ति भी अवरोध है और पा जाने का मौन अहसास एक राह है...श्वेत राह...। चलते जाईए आप खुद तक पहुंचेंगे आप वैराग्य को पा चुके होंगे...।

शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

’हमारी दुनिया में परिंदे’


 ’हमारी दुनिया में परिंदे’  प्रकृति दर्शन, ई-मासिक पत्रिका का ताजा अंक...। आप इसे गूगल प्ले बुक्स पर क्रय कर पढ़ सकते हैं...। इसके लिए नीचे लिंक पर क्लिक कीजिएगा...। कवर पेज पर फोटोग्राफ फोटो एडिटर रह चुके आदरणीय अखिल हार्डिया जी, इंदौर का है...। 

ये हमारी अपनी पत्रिका है और इसका संपादन पिछले चार वर्षा से मेरे द्वारा ही किया जा रहा है, ये प्रकृति को समर्पित पत्रिका है इसके पूर्व में निकले अंकों में हम नदियां, सूखा, बाढ़, प्रदूषण, आपदा जैसे विषयों को प्रमुखता से उठा चुके हैं। आप भी चाहें तो इस पत्रिका में लेखन के तौर पर साथ आ सकते हैं। हम हर अंक का विषय तय करते हैं और उसकी सूचना भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दे दी जाती है, इससे पहले फेसबुक पर उसकी सूचना दी जा रही थी अब ब्लॉग पर ही अवगत कराया जाएगा। 


अधिक जानकारी के लिए आप संपर्क कर सकते हैं


ईमेल         editorpd17@gmail.com

व्हाटसएप नंबर  8191903651

https://books.google.co.in/books/about?id=7xQaEAAAQBAJ&redir_esc=y


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

दीयों का दर्शन



 दीयों की लौ को देखा है, शांत एकाग्र होकर...। देखियेगा वो अस्थिर लौ हवा को सहती हुई अपने आप को स्थिर करने का एक पूरा युद्व झेलती है, आखिरकार एकाग्र होती है। आपको वो उस पल शांत नजर आएगी जब हवा की कई सारी कोशिशें उसे बुझा नहीं पातीं। ओह दीयों का दर्शन और दर्शन के लिए दीये दोनों काफी कुछ एक हैं क्योंकि दोनों में देखने का एक गुण परिपक्व हो रहा है। दीयों का दर्शन हर वर्ष दीपावली की स्याह रात में अंधेरे के लिए जीत का एक युद्व होता है जो छोटे-छोटे दीये हर साल जीतते हैं बस हम उन्हें प्रज्जवलित कर भूल जाते हैं, लेकिन उनकी जीत को अपने जीवन में अंगीकार नहीं करते....। दीया हो जाईये, ये मत सोचिये कि आपको बहुत तपना है ये सोचिये आपकी आभा कितनों का जीवन रौशन करेगी...। 

ठूंठ एक थके आदमी का मन है


 जब भी किसी ठूंठ पर अंकुरण देखता हूँ, मेरा भरोसा हर बार प्रबल होता है कि थका हुआ और थकाया गया व्यक्ति अवश्य जीतता है। ये जो अंकुरण है उस थके आदमी की हौले से ली गई मुस्कान है, जो वो नीम की छांह में, अकेले अपनी झोपड़ी के कच्चे दालान में या अपने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए अभिव्यक्त करता है। मैं सोचता हूँ एक सख्त ठूंठ एक थके आदमी का मन है, शरीर भी हो सकता है। एक जीतता आदमी वाकई अंकुरण सा खूबसूरत लगता है...। मैं पौधों की जात पहचानता हूँ, वे एक ही हैं हम जैसे। जैसे कि एक आदमी होता है, वो हर बार, कई बार, सदियों उगता है अपने अंदर...। सूखता है, पत्तों सा झरता है, खाद हो जाता है फिर अंकुरित हो उठता है...। अंकुरण और आदमी में एक समानता है कि दोनों हारते कभी नहीं...।

रंगमंच

 कहानी...


ये मुखौटे कहां रख दिए हैं रहीम, कहां चले गए हो भाई्? देखो ये इस तरह मुखौटे कहीं भी मत रखा करो। तुम जानते हो कलाकार आने ही वाले हैं और उन्हें ये मुखौटे पहनना हैं। मास्टरजी आप भी कब तक इन टूटे हुए मुखौटों के सहारे अभिनय का गुर सिखाते रहोगे। ‘छोटा मुंह बड़ी बात’ लेकिन अब तो समय ये है कि राह चलते चेहरे बोलते हैं ऐसे में इन भावविहीन मुखौटों को लगाने की सोचना क्या पुरानी बात नहीं हो गई? 

मास्टर रामानंद उसकी बात सुनते रहे और कुछ देर खामोश रहने के बाद बोले बहुत अच्छा बोलता है लेकिन ये जो रंगमंच है ना, यहां अच्छे-अच्छे कलाकारों के चेहरों का पानी उतर जाता है। रहीम बोला मास्टरजी मैं तो आपके सामने बच्चा हूं और आपसे सीख ही रहा हूं लेकिन इसे मेरी बुरी आदत मान लीजिये कि अपने मन की तो मैं दबा नहीं सकता हूं। मास्टरजी बोले बेटा तू मेरी बात ध्यान से सुन जो चेहरे तुझे बोलते नजर आते हैं कभी उनसे अकेले में बात करने की कोशिश की है, करके देखना वे बोलना भूल जाएंगे क्योंकि जिसे तू चेहरों की बोली समझ रहा है दरअसल वो आज की आपाधापी भरी जिंदगी के सवालों की उलझनें हैं जिन्हें सुलझाने वाली स्थिति चेहरों पर हर पल नए भाव लाती है। मुझे खुशी है कि तू चेहरों को पढ़ने की कला तो सीख चुका है। चल अब इस मुद्दे पर कभी और बात करेंगे लेकिन तू उन मुखौटों को सही जगह संभालकर रख दिया कर। 

रहीम हाथ में पंछा लेकर पुरानी सी लकड़ी की अलमारी की ओर मुड़ा लेकिन अगले ही पल पलटकर खड़ा हो गया। माफ करना मास्टरजी मैं ये तो पूछना भूल ही गया कि बोलते चेहरों पर ये सपाट मुखौटे चढ़ाकर क्या हम हकीकत को ढांकने की कोशिश नहीं करते। मास्टरजी ने मोटा सा चश्मा आंखों पर चढ़ाया और बोले सारा ज्ञान आज ही ले लेगा या कुछ बाद के लिए भी छोड़ेगा, चल तू पूछ ही रहा है तो बता देता हूं। रंगमंच पर बोलते चेहरों का अपना सम्मान है लेकिन कुछ अभिनय ऐसे भी होते हैं जिनमें चेहरों को बोलने की आजादी नहीं होती। उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उस समय नहीं दी जा सकती जब भावहीन चेहरों को जिंदगी का सबक पढ़ाना हो। रहीम सिर हिलाने लगा तभी मास्टरजी बोल पड़े अरे समझा या यूं ही दब्बू बच्चे के तरह सिर हिला रहा है, उसने सिर खुजाया और बोला कुछ रह गया है, चलो मैं बाद में पूछ लूंगा। मास्टरजी मुस्कुराए और काम में जुट गए। 

रहीम मुखौटों से भरी बड़ी सी पोटली को कांधे पर टांगे मंच की ओर बढ़ने लगा तभी मास्टरजी बोले अब ये क्या लेकर आ रहा है। रहीम बोला मास्टरजी इसमें मुखौटे ही तो हैं। अरे मुखौटे! इस तरह भरकर रख दिए थे क्या? निकालो, जल्दी से निकालो देखो भला हालत क्या हुई है। 

अरे ये तो रहमदिल इंसान का मुखौटा है लेकिन ये तेरी पोटली है या ये बिगड़ैल दुनिया। देख इसने इस रहमदिल इंसान के मुखौटे की क्या हालत बना ही है अब ये बेईमान सेठ लगने लगा है। अरे और ये क्या नेता का मुखौटा यहां ऐसे दबाकर क्यों बांधा है अरे इसके तो गले पर फंदा है। रहीम तू कैसा व्यक्ति है बड़े-बड़े नेता जो घोटालों में फंस रहे हैं वे आजाद हैं लेकिन तूने इस नेता के सच्चाई बयां करने वाले मुखौटे को फांसी लगा रखी है। ये क्या समाजसेवी का चेहरा और इस पर इतनी अधिक कालिख ? अरे भाई रहीम ऐसे तो तू मेरी इस मुखौटों वाली कायनात को मिटाकर ही रख देगा। समाजसेवी तो उजले विचारों वाले होते हैं लेकिन तेरी इस पोटली में उस पर कालिख आखिर लगी भी तो कहां से। अरे वाह रे रहीम तेरे भी क्या कहने, ये देखो भ्रष्टाचारी नेता का मुखौटा कितनी अच्छी तरह से सहेजकर रखा है मजाल है एक भी सलवट तो आ जाए। रहीम मैं ये बात समझ गया हूं कि भ्रष्टाचारी को बांधना आसान नही है उससे बचने के लिए बड़े हौंसले की आवश्यकता है। अब नजर जोकर के मुखौटे पर पड़ी वह अब भी उसी हालत में था, देखकर हंसी आ गई। रहीम ये जोकर का मुखौटा देख तो सही कैसे उस नेता की टोपी के पीछे से झांक रहा है, अरे जोकर है तू जोकर बनकर क्यों नहीं रहता। तेरी इस हरकत में भले ही ईमानदारी छिपी हो लेकिन लोग तो हंसेंगे ही। तू सच भी बताएगा तो भी लोग उसे मजाक ही मानेंगे। अरे ये कलाकार का मुखौटा तो यहां भी परेशानियों में जकड़ा हुआ है। इसके मस्तक पर देखो जितनी लकीरें पिछली बार थीं उससे कहीं अधिक हो गई हैं। 

अरे रहीम बता तो सही ये क्या, रहीम बोला क्या हुआ मास्टरजी। मास्टरजी बोले अरे ये मुखौटा तो मैंने पहले कभी नहीं देखा। रहीम ये किसका मुखौटा तूने इस भीड़ में शामिल करने की कोशिश की है। रहीम बोला माफ करना मास्टरजी आपसे पूछे बिना ही मैंने एक आम आदमी भी इसमें शामिल कर दिया है, मुझे लगा हर नाटक, कहानी उसी के पेट से होकर निकलती है। मास्टरजी ने रहीम को पास बुलाया और गले से लगा लिया। चलो अब जल्दी से इन पर कपड़ा मारकर साफ कर दे वरना कलाकार आ जाएंगे और बातों में लग जाएंगे। 

मास्टर रामानंद शहर के पुराने मंचीय कलाकार थे, वे मंच को ही अपनो भगवान मानते थे। कला के लिए जीते और उसी में रमे रहते। उनका शार्गिद रहीम भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रहा था। मास्टर रामानंद के बल पर कभी कभार ही सही मंच और मंचन की चर्चा का दौर चल पड़ता था वरना  अपनी सनकी सी जिद पर जीने का आदी हो चुका था। कोई किसी की नहीं सुन रहा था। मास्टरजी बाहर के बड़े हॉल में नाटक ‘तुम्हारी भी जय, हमारी भी जय’ की तैयारियों में जुटे हुए थे। रहीम बोला ये तो बताईये मास्टरजी कि ये जो नाटक का मंचन हम यहां करने जा रहे हैं वो किस पर आधारित है। मास्टरजी बोले अरे तू समझ नहीं रहा है ये दुनिया में अब एक तीसरा वर्ग भी पैदा हो गया है। तीसरा वर्ग! इसका मतलब क्या है मास्टरजी ? अरे एक वर्ग तो ईमानदार है जो कम होकर गिनती का रह गया है, उनमें से भी कुछ बोलते नहीं और कुछ बोलते हैं तो उन्हें खामोश कर दिया जाता है। दूसरा वर्ग हो भ्रष्टाचारियों का हो गया, वो किसी की सुनते नहीं। तीसरे वर्ग की बात करें तो ये वो है जो न पूरी तरह से ईमानदार है और न ही पूरी तरह से बेईमान। ये सबसे घातक लोग हैं जिनसे पार पाना होगा। यही वो वर्ग है जो आगे बढ़कर पूरी तरह से भ्रष्ट बन जाता है। हमें उस गांठ को दिखाना है जो इस वर्ग को बढ़ावा दे रही है। रहीम बोला अरे मास्टरजी मुझे ये नहीं समझ आ रहा है कि अब हम नाटक में गांठ कहां से दिखाएंगे। मास्टरजी बोले बेटा जीवन में कुछ बंधनों में गांठ पड़ जाती है जिन्हें खोलना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाता है। अरे मास्टरजी समझ गया आप उस गांठ की बात कर रहे हैं। बेटा तू अभी कुछ भी नहीं समझा खैर, अपने हाथ तेजी से चला हमें बहुत सा काम करना है। 

रहीम बोला मास्टरजी एक बात तो बताईये मुझे भी छोटा सा रोल दे दीजिये। अरे तू कहां नाटक कर पाएगा। तेरी सबसे बड़ी गलती क्या है पता है तू बोलता बहुत है। मैं तुझे एक रोल दे सकता हूं लेकिन वो खामोश रहने का है। तुझे लगातार ढाई घंटे तक मौन रहने का अभिनय करना पड़ेगा कर पाएगा। हां मैं कर सकता हूं आप एक बार भरोसा करके तो देखिये। मास्टरजी बोले तू जिद कर रहा है तो मैं तुझे आम आदमी का रोल दे देता हूं। वो आम आदमी का मुखौटा जो तू लाया है उसे लगाकर देख। अरे मास्टरजी मुझे मुखौटे की जरुरत नही है देखना मेरा चेहरा ही बोलेगा। 

अरे रहीम दो दिन बाद ही मंचन होना है और तैयारियों के नाम पर ये खाली मंच हमारे पास है। लो वो कलाकारों की पूरी टीम आ गई। बारी-बारी से सभी ने मास्टरजी के पैर छूए। मास्टरजी बोले देखो ये शो बहुत दिनों बाद हो रहा है। नई स्टोरी है इसका जितना अधिक अभ्यास करेंगे उतना ही अच्छा करके दिखा पाएंगे। सभी के हाथों में अपने-अपने संवाद के कागज थमा दिए गए। नेता बना हरमन टोपी को उलट-पलटकर देख रहा था और संवाद के कागज को लेकर वो कुर्सी पर जा धंसा। मास्टरजी बोले हरमन तुम एकदम सही जा रहे हो, कुर्सी की चिंता तो नेता को ही है बाकी लोग तो देखो वो बेचारे दरी पर बैठकर अपने संवाद रट रहे हैं। रहीम की आवाज आई अरे मास्टरजी मुझे भी तो संवाद दीजिये मुझे क्या वाकई कुछ नहीं कहना है। पहले ही बता चुका है तुझे कुछ नहीं बोलना है। बस तेरा चेहरा बोलेगा और अंत में तुझे पागल होकर ठकाके लगाना है और मुस्कुराते हुए चुप हो जाना है हमेशा के लिए। कोकिला बोली मुझे आपने समाजसेवी की जिम्मेदारी निभाने को दी है लेकिन मेरे लिए करने को तो कुछ भी नहीं है। मास्टरजी बोले अरे कोकिला तुम समझ नहीं रही हो, अब किसी के लिए भी करने के लिए कुछ भी बचा ही कहां है। समाजसेवी को इसी तरह रहना होगा। 

नाटक के मंचन की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। मंच को सजाने की जिम्मेदारी भी कुछ लोगों को सौंप दी गई थी। बाहर बैठक व्यवस्था में इस बार कुर्सियां नहीं रखीं जाएंगी क्योंकि पिछली बार कुर्सियों ने यहां भी विवाद करवा दिया था तभी मास्टरजी ने कहा था कि अब मेरे किस शो में कुर्सियां नहीं होंगी। केवल बिछायत ही होगी, चाहे वीआईपी हो या आम आदमी। सब एक साथ एक तरह से ही बैठेंगे। नाटक की फायनल रिर्हसल हो गई।  

आखिर शो शुरु हो गया। पर्दा उठता है हाथों को भींचे हुए नेताजी जग्गन भाई चीखते हुए चले आते हैं इस बार देखते हैं कि कौन है जो हमें पछाड़ने के लिए आगे आया है। पीछे से भीड़ की नारेबाजी शुरू हो गई। नेता के साथ चलने वाले एक अदने कार्यकर्ता ने कहा भाईसाहब देखो तो जरा ये लोग आपका विरोध कर रहे हैं। नालायक कहीं के, ये क्या जानें कि आपने इनके लिए क्या कुछ नहीं किया है? नेताजी का गर्व से सीना चौड़ा हो गया और उन्होंने उस चमचेनुमा कार्यकर्ता को गले से लगा लिया। नेताजी ने माइक संभाला और बिना किसी अभिवादन के सीधे शुरु हो गए। ये एक और चुनाव है और आप तो जानते हैं कि ये पूरा क्षेत्र मेरा है। अब ये भी बताने की आवश्यकता तो नहीं है कि मुझे हराने की तो कोई सोच भी नहीं सकता। तभी नारेबाजी करती भीड़ में से उठकर आम आदमी मंच पर आ बैठा। नेताजी की नजर उस पर गई और बोले देखो ये देखो हमारा स्नेह। हम अगर आम आदमी के नेता नहीं होते तो क्या ये इस तरह हमारे मंच पर चढ़ने की हिम्मत कर सकता था। वो आदमी गूंगा था केवल इशारा ही कर सकता था। पेट की ओर इशारा किया कि बहुत जोरों से भूख लगी है। उस आम आदमी का चेहरा रुंआसा हो गया। नेता ने उसके गूंगे होने का फायदा उठाते हुए कहा देखो आपके ही बीच का ये व्यक्ति बिना कुछ कहे कितनी बड़ी बात कह गया कि हमारे रहते इसे भरपेट भोजन मिला है। वो व्यक्ति नेता की ओर इशारा करता कभी पेट की ओर। दर्शकों ने तालियां पीट दीं। 

मंच पर से नेताजी उतर चुके थे। नेताजी के पक्ष में प्रचार करने वाले दो छुटभैया नेता चर्चा करने लगे। अरे ये चुनाव भी भाईजी ने ही मारा समझो। दूसरा बोला यार वो कुछ लोग जबरन की टसन ले रहे हैं। भाईजी को समझाकर उसका मुंह टुड़वा दूं क्या? अरे तू अभी खामोश हो जा वो भाईजी ने कहा है चुनाव में जब तक वो नहीं कहेंगे कुछ नहीं करना है। भाईजी कहते हैं अभी तक हवा उनके पक्ष में ही चल रही है। मंच पर दूसरी ओर से लल्लन भाई के कुछ कार्यकर्ता नारेबाजी करते हुए निकले। एक के हाथ में छोटा पॉकेट रेडियो था जिस पर भारत-वेस्टइंडीज टीम के क्रिकेट मैच की कामेंट्री चल रही थी। आधा ध्यान नारेबाजी पर और आधा मैच पर। जीतेगा भाई जीतेगा लल्लन भाई जीतेगा। जग्गन भाई के कार्यकर्ता बोले अरे ये लल्लन के लोगों के भी खूब ‘पर’ निकल आए हैं, अरे चुनाव बाद सबके ‘पर’ बारी-बारी से कतर देंगे। बस भाईजी जीत जाएं। 

मंच पर आम आदमी का प्रतीक वो बेहताशा होकर भीड़ के पीछे दौड़ता है। हाथ में कुछ कागज थे और चेहरा पसीने से भीगा हुआ। दूर से नेताजी के भाषण की आवाज आ रही है। अब हर गरीब की सुनी जाएगी। गरीबों की समस्याएं हमारी अपनी हैं, उनके घरों में अंधेरा है तो समझो हमारी दुनिया अंधकार में है। एक भी व्यक्ति हमारी पहुंच से दूर नहीं रहेगा। वो गूंगा व्यक्ति भीड़ से आगे जाने की कोशिश करता है तभी एक मजबूत सा हाथ उसे धकेल देता है। मंच पर गिरने की आवाज के साथ ही उसकी सिसकियां शुरू हो जाती हैं। अगले ही पल वो सिसकता हुआ उकड़ू बैठकर पसीना पोंछता है और नेताजी के भाषणों की विपरीत दिशा में चल पड़ता है। अगले ही पल लल्लनभाई कार्यकर्ताओं के साथ दौरे पर निकलते हैं। कड़क कुर्ता जो झुकने की कतई इजाजत नहीं दे रहा था। सामने झोपड़ी के बाहर बैठा आम आदमी उसे देखकर सहम जाता है। कार्यकर्ता दूर से ही आवाज लगाता है देख आज तेरी किस्मत खुल गई तेरे दरवाजे भाई आए हैं, मांग ले कुछ मांगना है। वो सहमा हुआ उठा और घर के अंदर गया हाथों में कागज निकलाकर दरवाजे तक पहुंचा कि लल्लन भाई काफी दूर दूसरे दरवाजे पर महिला के पैर छू रहे थे। कार्यकर्ता ने डंडा दिखाते हुए धमकाया ध्यान रखना वोट लल्लनभाई को मिलना चाहिए। वो एक बार फिर डरा-सहमा उकड़ू बैठ गया। 

मंच पर दोनों नेता लल्लनभाई और जग्गनभाई नजर आते हैं। क्यों लल्लन बहुत बड़े नेता हो गए हो, भूल गए का तुम हमारी ही क्लास में पढ़कर निकले हो। अरे जग्गनभाई अब समय बदल गया है। अब चेला शक्कर नहीं बल्कि मिठाई की दुकान होता है। दोनों के कार्यकर्ता मूछों पर हाथ फेरते हुए एक-दूसरे को घूर रहे थे। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगाया और कार्यकर्ताओं को दूर चले जाने को कहा। पर्दे के पीछे से आम आदमी झांक रहा था। जग्गन बोले देख लल्लन ये चुनाव मुझे जीत जाने दे, तू अपना नाम वापस ले ले। अगले चुनाव में तेरी जीत पक्की। इतना नहीं पांच खोका तेरे घर पहुंच जाएगा। अभी तू मलाई खा और राजनीति को समझ। लल्लन बोला ठीक है तुम ठहरे लल्लन के गुरु अब तुम्हारा कहना तो हम नहीं ना टाल सकत हैं। आम आदमी एक बार फिर सकते में आ गया। बस अगले ही दिन लल्लन ने अपने कार्यकर्ताओं को प्रचार करने से मना कर दिया और खामोश बैठ गया। चुनाव हो गया और जग्गन भाईजी जीत गए। जीतकर बड़े ही जोश के साथ लोगों के बीच पहुंचे। वो गूंगा आदमी अपने कागज लिए अब भी कतार में खड़ा था। नेताजी को उनके लोगों ने ऐसे घेर रखा था जैसे वो कहीं का कोहिनूर हीरा थे और जिसके चोरी हो जाने का भय था। 

चुनाव जीतने की खुशी में पार्टी रखी जाती है। जग्गन और लल्लन के हाथों में गिलास थे वे नशे में झूम रहे थे। वो आम आदमी एक बार फिर अपनी पीड़ा लेकर उस पार्टी में पहुंचा। वो अपनी बारी का इंतजार करने के लिए सजे हुए पेड़ के नीचे पत्थर पर बैठ गया। एक कार्यकर्ता आता है और उसकी बांह पकड़कर खड़ा कर देता है अरे तू कौन है और यहां तेरा क्या काम, चल चलता बन वरना भाईजी का मजा किरकिरा हो गया तो तेरी गर्दन उतरवा लेंगे। ये बात सुनकर वो बुरी तरह डर गया। उसने वो कागज दिखाते हुए इशारा किया ये जग्गन भाईजी को देना चाहता है लेकिन उस लठैत ने एक नहीं सुनी। वो रोता रहा, पेट पर हाथ फेरता गिड़गिड़ाता रहा लेकिन कोई देखने वाला नहीं था। वो भोजन का इशारा कर रहा था तभी पीछे से होटल का वेटर भरी प्लेट खाना लेकर आया और कूढ़ेदान में डाल गया। लठैत ने पूछा अरे क्या हो गया इतना भोजन क्यों फैंक रहा है वो बोला भाईजी ने ये भोजन अपने कुत्ते के लिए बनवाया था उसने जब इसे सूंघा तक नहीं तो मुझे फैंकने के आदेश दे दिए। अब उसके लिए दूध का हलवा बना रहा हूं। वो आम आदमी दोनों की बात सुनकर बार-बार जीभ घुमा रहा था तभी एक नजर उस लठैत की पड़ गई उसने एक जोरदार लात उसके पेट में मारी। भिखारी कहीं का, तेरे वोट से जीते हैं क्या हमारे भाईजी? वो तो अपने कौशल से चुनाव जीते हैं। लात का दर्द सीने में लेकर वो उठा और कुछ चलने के बाद अपने बालों को पकड़कर जोर-जोर से कूदने लगा। कभी सिर को पीटता तो कभी छाती को। नजदीक रखे पत्थर पर बैठकर वो हंसने लगा। लठैत को और गुस्सा आया उसने दो लाठी और टिका दी। वो जमीन पर जा गिरा और हंसता हुआ मौन हो गया। अंदर लल्लन भाई भोजन में से हड्डी निकालकर जग्गनभाईजी के कुत्ते को खिलाकर ठहाके लगा रहे थे। लठैत ने आदमी की मुट्ठी से वो कागज छीना और खोला- मैं और मेरा परिवार चार दिनों से भूखा हूं, मुझे और मेरी पत्नी को एक आसाध्य रोग ने घेर लिया है। काम कुछ नहीं है और करने की हिम्मत भी नहीं है। दो बच्चे हैं उनकी भूख देखी नहीं जाती। महंगा अनाज खरीदने के लिए मेरे पास रुपए नहीं हैं। आप मेरे परिवार पर रहम करो। कागज पढ़़ने के बाद लठैत ने एक नजर उस आदमी पर डाली और दूसरी नजर अंदर पार्टी में झूम रहे जग्गनभाईजी पर। उसने वो कागज के कई सारे टुकड़े किए और आदमी के उपर फैंककर वहां से चला गया। पर्दा गिर जाता है। तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। 

सभी उस आम आदमी के किरदार निभाने वाले रहीम से मिलना चाहते थे। आम आदमी के किरदार की ही चर्चा हॉल में हो रही थी। मास्टरजी दौड़ते हुए मंच पर आए। दूसरे सभी साथी एक-दूसरे से लगे मिलकर अच्छे शो की बधाई दे रहे थे। रहीम अब भी जमीन पर ही पड़ा हुआ था। मास्टरजी ने पास आकर कहा अरे तू तो बहुत बड़ा कलाकार बन गया रहीम। आम आदमी बनकर तू कितना चर्चित हो गया बाहर चलकर देख। दर्शक तेरे ही बारे में चर्चा कर रहे हैं। रहीम उठ भी जा बेटा ये मसखरी बहुत हो गई। शो हो गया है और बाहर दर्शक तेरा इंतजार कर रहे हैं। मास्टरजी की इतनी बात सुनकर भी जब रहीम नहीं उठा तो उन्होंने उसे हाथ से हिलाया लेकिन ये क्या वो तो अब इस दुनिया से विदा हो चुका था। मास्टरजी ने उसे खूब हिलाया, साथी कलाकार उसे घेरकर खड़े हो गए। मंच की पर्दा व्यवस्था संभालने वाले में भी खलबली मच गई वो रस्सी छोड़कर आ पहुंचा। उसके हटते ही मंच पर्दा एक बार फिर हट गया। खड़े हुए दर्शक एक बार फिर अपनी जगह पर बैठ गए। आवाज आई अरे अभी एक्ट खत्म कहां हुआ है- मंच पर मास्टरजी उसे उठाने के लिए जोर-जोर से हिलाने लगे। रहीम उठ जा बेटा, ये तू क्यों कर रहा है, मुझ बूढ़े को इतना गहरा दर्द मत दे। रहीम नहीं उठा तो मंच पर चीत्कार बढ़ गया। मास्टरजी बोले अबे रहीम तू तो बड़ा ही कलाकार निकला, मैंने तो तुझे आम आदमी की पीड़ा दिखाते हुए मूक रहकर अंत में दम तोड़ने के अभिनय की बात समझाई थी लेकिन ये क्या तू तो हकीकत में हमें छोड़कर चला गया। दर्शक स्तब्ध थे कमरे में गहरा सन्नाटा पसर चुका था। आम आदमी की मौत पर खासो-आम खामोश खड़े ये हकीकत देख रहे थे। मास्टरजी उठकर खड़े हुए और अपने हाथों से मंच का पर्दा खींचकर बंद किया। मास्टरजी धीमे सुर में बोले तू तो इस रंगमंच का सबसे मंझा हुआ कलाकार निकला, ऐसा अभिनय कर गया कि ये रंगमंच हमेशा तेरा ऋणी हो गया। रहीम के शव को घेरकर सारे कलाकार बैठे थे, लाइट इफेक्ट धीमा होता हुआ स्याह काला हो गया और रहीम एक गहरे शून्य में समा गया। 

अगले दिन नाटक और उसमें हुई घटना की सर्वत्र चर्चा हो रही थी। खबर में पढ़कर लोगों को पता चला कि दरअसल आम आदमी का अभिनय कर रहे रहीम को दिल का दौरा पड़ा था। डॉक्टरों ने कारण बताया वो उस माहौल में पूरी तल्लीनता से डूब गया था और मंच पर जो भी हुआ उसका दर्द उसके लिए असहनीय साबित हुआ और उसने दम तोड़ दिया। हॉल में मास्टरजी अकेले बैठे थे उन्होंने मुखौटों के उस ढेर में से आम आदमी का मुखौटा निकाला और उसे टकटकी लगाए देखते रहे, रह रहकर वे अपना सिर पीछे की ओर घुमा रहे थे लेकिन आज रहीम नहीं था और उसके सवालों का कोलाहल भी नहीं था। अब केवल एक गहरा शून्य था। मास्टरजी ने आम आदमी के मुखौटे को दोनों हाथों से पकड़कर भींच लिया  लेकिन उसकी रोनी शक्ल देखकर बाजू में टेबल पर रख दिया। मास्टरजी लंबी सी कुर्सी पर लेट गए तभी बिजली बंद हो गई लेकिन मुखौटों पर खिड़की के बाहर से मरक्यूरी की रोशनी पड़ रही थी वे सभी एक-दूसरे में गुत्थम-गुत्था हो चुके थे। दूर टेबल पर आम आदमी का मुखौटा बदहवास सा दूसरे मुखौटों पर नजरें गढ़ाए हुए था...वो अपनी मौत पर हक्का-बक्का था। 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

जड़ों का चिंतन...

 

जड़ों को देख पाना आसान नहीं होता, हम तो केवल महसूस कर लें....। कल एक पौधे को गमले से निकाल कर फैंका गया होगा... मेरी उस पर नजर ठहर गई...। जड़ों से रिश्ता क्या होता है और कितना गहरा होता है कुछ हद तक जान पाया...। सोचता हूँ जब एक छोटे पौधे की जड़ें इतनी घनी और सघन हैं तो आदमियत की जड़ें, मानवीयता की जड़ें, भरोसे की जड़ें और भी बहुत है जिनकी जड़ें गहरी हैं...। हम तो केवल ऊपर के सौंदर्य को देखने के आदी हैं, जड़ें कोई देखता ही कहां है और सीधा तर्क ये कि उसमें ऐसा होता ही क्या है, उलझनों और बदसूरती के अलावा... । मैं काफी देर बैठा रहा उस जड़ के पास...अंदर से जड़ होता रहा, विचारों और मानव की उलझनों में जड़ता को उलझता देख...। ओह ये जड़ें और हमारा समझदार हो जाना कितना अंतर है, कितना कुछ छीन कर ले गई ये समझदारी हमसे... इससे तो नादान ही भले थे...।

मौजूदा हालात में पीपल हो जाईये

कौन किसे पनपने देना चाहता है, कौन किसी को जगह देगा.. कुछ मुट्ठीभर अपवाद लोगों को छोड़ दीजिए... बहुत धक्का मुक्की है, कोई किसी को सहन नहीं करना चाहता... आपका हुनर और मन साफ रखते हैं तो मेरी मानिए पीपल हो जाईये... पीपल से जीवन दर्शन सीखिए...विपरीत हालात में वो अपनी जिद पर बिना किसी से ये उम्मीद लगाए कि कोई अंकुरण के लिए जगह और जल देगा... उग जाते हैं, बिना किसी की परवाह के बढ़ते जाते हैं, कोई हटाता है, फिर उग जाते हैं...सोचिये इतने महत्वपूर्ण वृक्ष को जब पनपने में इतना संघर्ष है तो हम तो इंसान हैं... पीपल जिद्दी वृक्ष है लेकिन जीतना जानता है, हारना उसने सीखा ही नहीं... इसीलिए उसे श्रीकृष्ण का नेह भी मिला... उन्होंने कहा वृक्षों में मैं पीपल हूँ...। जीतना चाहते हैं तो पीपल हो जाईये... और उसे बचाईये...

कान्हा से श्रीकृष्ण हो जाना


कान्हा से भगवान श्रीकृष्ण हो जाना एक यात्रा है, एक पथ है, मौन का गहरा सा अवतरण...। कान्हा हमारे मन के हर उस हिस्से में मचलते हैं, खिलखिलाते हैं, घुटनों के बल चलते हैं...जहां हम उन्हें अपने साथ महसूस करना चाहते हैं। कान्हा बचपन के शीर्ष हैं, कान्हा आदर्शों की जिद हैं, वे एक यथार्थ सच को बेहद सहजता से व्यक्त करना जानते हैं, वे कान्हा हैं और उनका होना हमें इस बात का भी अहसास करवाता है कि उम्र की ये समझदारी वाली सबसे छोटी सी गांठ बेशक दिखने में कमजोर होती है लेकिन भाव और अहसासों के बंध इसे मुखर बना देते हैं...। कान्हा के बचपन के पूरे कालखंड को समझें तो स्पष्ट हो जाता है कि वे जो भी करते रहे, उन्होंने जो भी किया या इस संसार को जो भी दिखाया वो जटिलतम सत्य था जिसे उन्होंने अपनी शैली से आसान बना दिया। वो लीलाएं...वो ब्रज और वृंदावन की गलियों में घूमने का सत भी एक सत्य उजागर करता है कि ये आयु, ये जीवन....उसी राह चलेगा जिस राह इसे चलना है लेकिन वो राह, वो सफर हम कैसे सहज और सुंदर बना सकते हैं....उसे कैसे अपने अनुकूल ढाल सकते हैं...ये हमें हमारे आराध्य सिखाते हैं। वे कान्हा रहे, वे कान्हा आज भी हैं...घर-घर और हमारे मन के झूलते सिंहासन में...। वे इसी रुप में हमें अधिक पसंद हैं, भाते हैं, वे इसी तरह मन में गहरे और गहरे समाते हैं....। 

वे जब कान्हा से श्रीकृष्ण हो जाते हैं तो एक अलग सी दिशा की ओर प्रशस्त हो जाते हैं, वे तब हमारी आस्था के परम हो जाते हैं, वे हमारे नेतृत्वकर्ता के रुप में नजर आते हैं...। उनके वचन, उनके गीता के उपदेश...हमें उनके एक ऐसे जीवन से मिलवाते हैं जो आध्यात्मकता का शिखर है, तप का परिणाम, मौन का मुखर और आस्था का उजास...। वे श्रीकृष्ण होकर चंचल नहीं हैं, तब वे एक संगठित हैं, चरम हैं और श्रेष्ठतम होने के सर्वोच्च विचार जैसे सुखद...। उनका वो चेहरा, उनका श्रीकृष्ण हो जाना....हमारी राह प्रशस्त करता है, हमें सिखाता है...उस मौन को महसूस कर उस पथ पर अग्रसर होने की एक किरण दिखाता है...। उनकी ये यात्रा हमेशा हमारे मन में गतिमान रहती है, हमारा मन उस यात्रा को महसूस करता है...वो परम की यात्रा....स्वर्णिम सी सुखद...।


फोटो गूगल से साभार..

ये कसीदे हमें ले डूबेंगे..

 .. हम भी अजीब हैं... कोई खिलाड़ी दोहरा शतक मार जाए तो हम उसे हीरो बना देते हैं, ऐसे कसीदे पढ़ते हैं कि वो बेचारा ओंधे मुंह जमीन पर आ गिरता है...। यही हाल राजनीति में भी है...हम नेताओं को जनप्रतिनिधि होने का अहसास करवाएं उन्हें हीरो न बनाएं... काहे हम यूं बावले हो जाते हैं... कोई जीतता है जश्न मनाएं लेकिन ये न हो कि उसे ये महसूस होने लगे कि सामने जनता नहीं शरणार्थी हैं...। हम कमजोर और असहाय दिखाते हैं तभी तो वे हमारी भावनाओं का चीर हरण करते हैं... हमने कभी अपना मुखर चेहरा उन्हें दिखाया है क्या..? दरअसल हमारी मानसिकता गुलामी कीहो गई है... तभी तो अपराधी और बिना पढ़े लिखे लोग हम पर राज करते रहते हैं पीढियों तक...। ओफ...बंद करो ये राग...जीत चाहिए थी हमने दे दी...अब उन्हें सोचना चाहिए कि मुझे पांच साल का हिसाब देना है...। कंजूस मतदाता बन जाईये... अपने मत का हिसाब मांगिये... वरना यूं ही नाम बदलते रहेंगे और हम छले जाते रहेंगे...। आजादी के इतने साल बाद भी हम मूलभूत समस्याओं में उलझे हैं... नेता. एक शौचालय भी बनाता है तो बोर्ड टंगवा देता है... और हम खुश हो जाते हैं... शरणागत होना छोड़िए और हम आजाद भारत के नागरिक हैं। वे राजसत्ता पाते ही बेलगाम इसलिए हो जाते है क्योंकि हम ऐसे है... चुनाव में आपके बाजू में होते हैं और जीतने के बाद वे ऊपर मंच पर और जनता जमीन पर...कितनी जलदी सीन बदलता है..। सोचिएगा जरूर... ये सभी पार्टियों और नेताओं के लिए है...

प्रेम प्रतिबिंब होता है

  यकीन कीजिए प्रेम प्रतिबिंब होता है और मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ क्योंकि आप देखिएगा किसी सुर्ख गुलाब को देखने पर ही हमारे अंदर भाव अनुभूति ब...