रविवार, 27 फ़रवरी 2022

काश बचा पाते बचपन का कोई कतरा



उम्रदराज़ होकर जब थककर सराबोर हो जाते हैं और कभी यादों की खिड़की खोलकर हम कुछ पल सुस्ताने लगते हैं तब अक्सर बचपन याद आ ही जाता है...। कितने मासूम से सवाल, चटख रंगों की कल्पना और मन की आकृतियां...। कहां खो जाता है बचपन, उम्र बढ़ने पर बचपन की खिड़की हमेशा के लिए बंद क्यों कर दी जाती है, क्यों एक कतरा बचपन भी नहीं बचता हमारे भीतर...। ओह आज जब हमारे भ्राता और अज़ीज़ मित्र राजेंद्र नेगी जी की मासूम सी बिटिया तनीशी का आर्ट देखा तो विषय भी लौटा और बचपन भी...। आप भी देखिए उम्र के आरंभिक दौर का ये मिजाज़... अहा। गजब कल्पना और गजब रंग संयोजन। हमें लगता है उम्रदराज़ होकर हम जो एक दुनिया बसाते हैं वह हमारे अनुसार श्रेष्ठ है लेकिन हकीकत यह है वह बहुत उलझन भरी, ठसाठस, दिखावे वाली और बेबसी से भरी हुई है। नासमझ बचपन की दुनिया कितनी खूबसूरत है और कितनी चटख रंगों वाली, देखिए हर तस्वीर कितना खूब कह रही है। सोचता हूँ यह बचपन यदि जिंदगी की इबारत है तो बिसरा क्यों दी जाती है, क्या विवशता है कि हम उसमें लौटने के लिए भी संकोची हो जाते हैं... । बचपन समझेंगे नहीं तो बच्चों को कैसे समझेंगे और उन्हें बचपन कहां से देंगे, एक उम्र मासूमियत भरी हम सभी जीते हैं लेकिन हकीकत यह है कि बड़े होते ही हम मन को काठ का बना लेते हैं, सबसे पहले भावनाओं को निचोड़कर उम्र की रस्सी पर सुखा देते हैं, हम यह भी नहीं समझते की हम बचपन को भी सुखा देते हैं, सूखा  हुआ बचपन एक पलायन वाले गांव सा ही हो जाता है... यह कैसा पलायन है एक उम्र का बचपन से पलायन...। ओह काश की एक कतरा बचपन हम बचा पाते ...। हम पूरी उम्र एक कुशल कारोबारी की तरह जी जाते हैं, हमें कारोबारी होता देख बच्चे भी गणित सीखते हैं और रंगों की उम्र यदि बेरंग और  उसका कैनवस श्वेत ही रह जाता है तो यह पूरी उम्र की हार है....। सोचिएगा कि बेशक उम्रदराज़ होकर हम स्टेटस तो पा लेते हैं लेकिन भावनाओं को सुखाकर मिली इस उपलब्धि पर हम एक जगह तन्हा हो जाते हैं...। खैर जब हम समझदार हो जाते हैं तो किसी की नहीं सुनते, अपने आप की तो कतई नहीं...। बचपन यदि बचपन है, रंगों से भरा है तो वह अवश्य गढ़ेगा... समय, जीवन और उम्र...। 

खूब दुलार प्यारी बिटिया तनीशी...। खुशी है कि राजेंद्र नेगी जी ने यह फोटोग्राफ सोशल मीडिया पर गर्व और खुशी के साथ शेयर किये हैं...।

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

अपने से बात तो कीजिए

पत्ते गिरते हुए भी मुस्कुरा रहे थे
मैं आदमी होकर भी डरा सा हूँ। 

जगजीत जी की गज़ल सुन रहा था... 
कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है...?
शब्द क्या हैं, पूरी किताब लिखी जा सकती है... वाकई ये आसान तो नहीं है। गुबार ही गुबार हैं... मन बैठा जाता है कई बार, कौन पूछता है और कितना पूछता है और क्या बताया जाए और कितना कहा जाए...। शब्दों और विचारों के बीच कहीं कोई अनुबंध है? शायद है तभी तन्हा होकर केवल मन ही मथता है, मन की जमीन, मन का आसमां... आखिर कोई कैसे छू  सकता है किसी के विचारों का आसमां। तन्हा हो जाना एक अवस्था है लेकिन इसका आध्यात्म से गहरा रिश्ता है। तन्हा हो जाना बिखराव भी लाता है और समग्र भी बनाता है। तन्हा होकर मौन हो जाना आपको कई कतरों में बिखरने पर मजबूर कर देगा, लेकिन हम बात करें अपने आप से, नित्य वार्तालाप जरूरी है अपने आप से...। सच यह है हम अपने से ही ईमानदार हैं और अपने से ही बगावत कर जाते हैं। हम जीतना जानते हैं तभी हम खामोश हो जाते हैं, एकांकी होना हमेशा ही खराब नहीं होता लेकिन केवल एकांत ओढ़कर खो जाना और अपने से कोसों दूरी बना लेना हमारी हार है...। तन्हा होकर हम साथ और करीब आ सकते हैं, कोई कोलाहल नहीं होता, एक श्वेत आकाश हम गढ़ सकते हैं... केवल अपने से बात ही तो करनी है, 

बहुत शोर है दुनिया में कि हम फिर भी हंसते हैं, दुनिया दीवानी है या हम ही फकीर हैं...। यह रिश्ता अपने आप से हमें सच और केवल सच दिखाता है..।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

प्रकृति दर्शन का अगला अंक...तालाबों पर...। आलेख आमंत्रित

अगला विषय- ‘खरे-खरे हैं तालाब’- आलेख आमंत्रित 

प्रकृति दर्शन, पत्रिका का अगला अंक ‘खरे-खरे हैं तालाब’ पर केंद्रित है। दोस्तों जल दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भूजल हो या पेयजल सभी के लिए तालाब बहुत महत्वपूर्ण हैं। तालाबों का खरापन आज के दौर में महत्वपूर्ण है। इसे समझना जरुरी है और समझकर इस दिशा में मिलकर कार्य करना आवश्यक है। ठंड के बाद अब गर्मी आने को है और यही वह समय है जब तालाबों पर, उनकी सेहत पर उनके रखरखाव पर बात होनी चाहिए। तालाब इस दौर में खरे हैं क्योंकि राजस्थान सहित देश के अन्य हिस्से इसके गवाह हैं। तालाब किस तरह महत्वपूर्ण हैं, आप किसी तालाब की बदहाली पर भी लिख सकते हैं क्योंकि पुराने तालाब इस दौर में समाप्त भी हो रहे हैं, कचरे से पट रहे हैं। आप भी तालाबों के विषय पर लिख सकते हैं, हमें आलेख 21 फरवरी तक ईमेल पर प्रेषित किए जा सकते हैं...। आलेख के साथ फोटोग्राफ और संक्षिप्त परिचय भी अवश्य भेजिएगा।

धन्यवाद

संदीप कुमार शर्मा,
संपादक, प्रकृति दर्शन पत्रिका
ईमेल- editorpd17@gmail.com
मोबाइल/व्हाटसऐप- 8191903651

प्रेम प्रतिबिंब होता है

  यकीन कीजिए प्रेम प्रतिबिंब होता है और मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ क्योंकि आप देखिएगा किसी सुर्ख गुलाब को देखने पर ही हमारे अंदर भाव अनुभूति ब...