शनिवार, 30 जुलाई 2022

ये जो मन है ना...


यह मन उम्मीदों के गुब्बारे जैसा है, हर पल नई उम्मीद, बस खोजता ही रहता है। कई दफा मन की दुनिया हकीकत से उलट सोचती है। मन का आधार भाव और भावनाएं हैं वहीं दिमाग तर्क पर फैसले सुनाता है। सोचता हूँ निर्णय के लिए उस परम पिता ने यह दो तरीके क्यों रखे होंगे। क्या केवल तर्क पर निर्णय ठीक नहीं होते या केवल भावनाओं पर फैसलों पर सवाल उठते हैं? इस दुनिया को उस परमात्मा ने खूबसूरती से रचा है, केवल तर्क की दुनिया सख्त और बहुत सख्त हो जाती तो संभवतः ये मन की दुनिया रचाई... जैसे बिना खुशबू फूल का महत्व नहीं है... वैसे ही जीवन में भाव और भावनाओं का भी महत्व है। मन दिमाग की परवाह नहीं करता और दिमाग मन से बगावत करता रहता है। मन अपनी दुनिया रचता है, बसाता है, बुनता है लेकिन यह भी सच है केवल खुशबू से ही फूल और जीवन सुरक्षित नहीं रह सकते, उसकी सुरक्षा का निर्धारण दिमाग करता है। इन दोनों के बीच सामन्जस्य बैठाना जरूरी होता है। तारतम्यता जरूरी है क्योंकि मन भाव की भाषा जानता है और दिमाग के अपने सख्त अध्याय होते हैं। यह विषय बहुत मंथन का है... ईश्वर ने दोनों दिए हैं तो अर्थ दोनों का है...। समझिए और निर्णय लीजिए। 

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