मंगलवार, 16 अगस्त 2022

किसी को बादल...किसी को बाढ़...

हे ईश्वर ये कैसा दौर है, कहीं बारिश का इंतज़ार है तो कहीं बारिश प्रलय कही जा रही है। यह कैसा दौर है जो हिस्से सूखे रह जाया करते थे आज बाढ़ की चपेट में हैं और जहां प्रचुर बारिश थी वहां औसत बारिश भी नहीं हुई...। यकीन मानिए कुछ तो बदला है हमने और हमारी सनक ने...। प्रकृति का अपना नजरिया है और वह सालों से जांचा परखा है...। हमने नदियों को रास्ता नहीं दिया उनके रास्ते में आ गए, हमने नदियां खत्म कीं, जंगल उजाड़े, प्रकृति को ताकत देने वाले पौधे हमने नकार दिए, हमें स्वाभाविक प्रकृति पसंद नहीं है, हमें प्रचंड गर्मी में अथाह ठंडक चाहिए, हमें ठंड में कृत्रिम गर्मी चाहिए...। हमें बारिश केवल बाढ़ की तरह ही आफत लगती है, हमें बच्चों से प्रकृति पर बात करना पसंद नहीं है, हम पक्के घर, शहर और सीमेंट जैसी मानसिकता को अपना चुके हैं...। दोष किसी को मत दीजिए सालों प्रकृति ने संतुलित बंटवारा किया, अब जो हो रहा है वह हमारी जिद है, हमारी सनक है...। एक खूबसूरत दुनिया हमने ऐसी बना दी है... सोचिएगा... अभी बहुत है जिसे समझना होगा...। पहले कच्चे घर और दालान होते थे, रौशनदान होते थे, गांव में लगभग हर घर एक वृक्ष होता था, हरेक के पास समय होता था, मौसम पर बात होती थी। तब एक सप्ताह की झड़ी होती थी लेकिन आपदा नहीं होती थी, सुव्यवस्थित नगर संयोजन था, बारिश के पहले नालियां और नाले साफ होते थे, नदियां स्वतंत्र अपनी राह बहती थीं, हम खुश रहते थे, दूसरों के साथ मिलकर चलते थे, बारिश की मनुहार में गीत गाए जाते थे... अब सबकुछ बदल गया है...। क्या करें ...बस चिंतन कीजिए...। 

 

बुधवार, 10 अगस्त 2022

‘बाढ़ ढोते शहर’ दोषी कौन...?

 
राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘प्रकृति दर्शन’ का अगस्त माह का अंक तैयार है....तकनीकी कारणों से देरी से आ रहा है इसलिए क्षमाप्रार्थी हैं। आवरण पर ख्यात वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर अखिल हार्डिया, इंदौर, मप्र का फोटोग्राफ है...। अंक इस लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि बाढ़ अब एक चुनौती बनती जा रही है, हमने सवाल उठाए हैं कि क्या केवल नदियां दोषी हैं बाढ़ के लिए....या हमें नगर नियोजन की समझ कम हैं या हमारा नगर नियोजन ठीक होना चाहिए...? महत्वपूर्ण सवाल उठाता यह अंक देखिएगा...।
यह अंक ऐप भी उपलब्ध है...ऐप आप गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं..। ऐप पर पत्रिका के कुछ अंक पूरी तरह से निःशुल्क हैं। आप यदि पहली बार पत्रिका देख रहे हैं और पढ़ना चाहते हैं तो आप अपना व्हाटसऐप नंबर 8191903651 पर भेज सकते हैं, अपने संपूर्ण परिचय के साथ, ये भी लिखिएगा आप पाठक हैं या लेखक हैं। 
आभार...


संदीप कुमार शर्मा
संपादक, प्रकृति दर्शन, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका


 

प्रेम प्रतिबिंब होता है

  यकीन कीजिए प्रेम प्रतिबिंब होता है और मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ क्योंकि आप देखिएगा किसी सुर्ख गुलाब को देखने पर ही हमारे अंदर भाव अनुभूति ब...