हम विकसित हैं तो नजर क्यों नहीं आते






पता नहीं इस पर शर्म आनी चाहिए या गर्व...क्योंकि इतनी खूबसूरत प्रकृति में जब हमें सही तरीके से जीते ही नहीं आया, समझ ही नहीं आया तब हम उसका शोषण करने लगे और उसके आदी हो गए, अपने नगरों और घरों के आसपास हमने कचरों के कुछ ऐसे पहाड़ बना लिए हैं। कैसे समझा सकता हूं कि हमारे ही शहर हैं, हमारे ही घर हैं और उन घरों शहरों के बीच हम भागते रहते हैं और जहां हमें सबसे अधिक सुकून मिलना चाहिए वहां हमें बदबू और बीमारियां मिलती हैं। हम अपने शहरों की बेहतर बसाहट पर कतई गंभीर नहीं है क्योंकि हमारा मन कचरा फैंकते समय एक पल के लिए हमें नहीं धिक्कारता है कि हम आखिर कर क्या रहे हैं....और हम सभी का कचरा जब एकत्र होता जाता है तब वह एक ऐसा खौफनाक चेहरा इख्तियार कर लेता है जिसे देखकर हमें तब भय लगना आरंभ होता है जब उससे बदबू आती है और आसमान पर सितारों की जगह अधिकांश कौवे और चील ही नजर आती हैं। 

कोई नहीं...हम न जागें किसी का कुछ भी नहीं खराब होगा, हमारा स्वास्थ्य, हमारा जीवन, हमारे बच्चों का भविष्य और हमारी उम्र की सांझ ही कालिख भरी होगी। बसाहट जरुरी है, वे पुरातन संस्कृति की बसाहट वाले नगर जो खुदाई के बाद भी सुव्यवस्थित निकले वह हमसे बेहतर थे, हम बेशक विज्ञान के युग का झुनझुना बजाएं लेकिन हकीकत यह है कि हमें अपने नगरों की बसाहट और हमारे जीवन के आसपास के माहौल को बेहतर तरीके से बुनना तक नहीं आया। खैर, समझिये कि एक थैली कचरा हम बेतरतीब तकीके से फैंकना आरंभ करेंगे तो वह कल हमारे लिए ही संकट बनेगा। कचरा चाहिए या जीवन...नगर के मुहाने पर पहले स्वागत द्वार बनाए जाते थे और अब कचरे के पहाड़ स्वतः ही आकार ले लेते हैं....वाकई हम विकसित समय के रहवासी हैं....तभी तो हम इस सुखद धरा और प्रकृति को मटियामेट कर उसे छोड़कर कभी मंगल और कभी चांद पर भागने की प्लानिंग बना रहे हैं। यदि हम वाकई विकसित हो रहे हैं तो हमारे आचार व्यवहार में वह नजर क्यों नहीं आता ?


संदीप कुमार शर्मा, संपादक, प्रकृति दर्शन, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 

photograph@sandeepkumarsharma

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